
उस दिन शनिवार था, शाम के आठ बजे थे। उस उस दोपहर को अपने कुछ ऑफिस के काम से मेरे पति तीन दिन के लिए दिल्ली गए है। उनके जाने के बाद, उस शाम मैंने अपनी ससुरजी, सासुमा और मेरी छोटी ननद गीता और बड़ी ननद संगीता को डिनर पर बुलाई। वैसे मेरे पाठकों को मालूम ही है की मेरी सासुमा मुझसे कुढ़ती है। और इसीलिए हम अलग से रहने लगे हैं। पहले तो सासुमा ना, ना करि फिर मेरे बहुत मानाने पर आने को राजी होगयी। डिनर के बाद मैंने मेरी ननद के लिए एक सिल्क की फैंसी घागरा चोळी, सासुमा और बड़ी ननद संगीता के लिए एक एक कंचि सिल्क साड़ी और ससुरजी के लिए एक Raymond का पैंट और शर्ट मटीरियल दी। साल में एक आध बार सासुमा के परिवार को कपडे रखना हमारे यहाँ रिवाज़ है।
डिनर के बाद जब वह घर के लिएनिकले तो मैं बोली "सासुमा, आज मोहन नहीं है, और मैं अकेली हूँ .. क्यों न आप् यही रुक जाते"






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