
छोटे से रेस्टोरेंट के उस तंग बाथरूम में हम दोनों अकेले खड़े थे। मैं उसके बिलकुल सामने था। उसने धीरे-धीरे अपनी पायज़ामा उतारा और उसे पास वाले बेसिन पर रख दिया। अब वह सिर्फ अपनी कुर्ती में थी—ऊपर ढकी हुई, लेकिन उसकी टांगें पूरी तरह नंगी, सफ़ेद टाइलों की ठंडक को महसूस करती हुई।
वह हल्का सा झुक कर मेरे और करीब आई, उसकी साँस मेरी छाती से टकरा रही थी। उसकी आँखों में वही शरारती चमक, वही गर्म सिहरन दौड़ रही थी। फिर उसने धीमी, काँपती आवाज़ में पूछा, “गोलू… क्या मैं अपनी कुर्ती भी उतार दूँ?”






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