
स्नेहा दीदी खड़ी हो गई और मैं भी उनके पास खड़ा हो गया। कमरे का माहौल अचानक और गहरा हो गया था। खिड़की से आती हल्की रोशनी उनके चेहरे पर पड़ रही थी और उनकी आँखों की चमक कुछ अनकही बातें कह रही थी।
स्नेहा दीदी धीरे-धीरे अपने कपड़े उतारने लगी। पहले उन्होंने अपना ढीला-ढाला टी-शर्ट सिर के ऊपर से निकाला और उसे एक तरफ रख दिया। फिर उन्होंने अपने छोटे शॉर्ट्स को धीरे-धीरे नीचे खींचा, उनकी जाँघों से सरकते हुए शॉर्ट्स फर्श पर आकर गिर गए। अब वह मेरे सामने केवल अपनी ब्रा और पैंटी में खड़ी थी।






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