
स्नेहा दीदी फिर एक बार बैंगलोर काम के लिए चली गई, और मैं अकेला रह गया। उनके बिना सब कुछ एक-दम आम सा लगने लगा। पहले हमारी बात-चीत मोबाईल के जरिए होती थी, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने मुझे जवाब देना कम कर दिया।
कभी मैं कॉल करता तो वह बिजी होने का बहाना बना देती, और मैसेज का जवाब घंटों बाद आता। पहले जो मुस्कान और अपनापन उनकी आवाज़ में झलकता था, वह अब गायब था। धीरे-धीरे मैंने महसूस किया कि वह मुझे नज़र-अंदाज़ करने लगी हैं।






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