
स्नेहा दीदी के दोनों हाथ कस कर दीवार को पकड़े हुए थे और उनका खुला पिछवाड़ा बिल्कुल मेरे सामने था। मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ा और कांपते हाथों से उनकी गोलाई पर अपनी उंगलियाँ फेरने लगा। जैसे ही मेरी हथेली उनकी नरम त्वचा से टकराई, मेरे रोंगटे खड़े हो गए। उनकी गर्मी और मुलायम स्पर्श ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया।
दीदी हल्का-सा सिहर उठी, उनकी कमर थोड़ी-सी हिली और उस हरकत से उनकी सुंदरता और निखर गई। मैं अपने हाथ को और मजबूती से उनकी गहराइयों तक फेरता गया, हर बार ऐसा लगता मानो कोई अनकहा राज़ मेरे हाथों में सिमट आया हो। उनका चमकता हुआ बदन, झुक कर लिया हुआ अंदाज़ और हल्की-सी करवट मुझे और भी दीवाना बना रही थी।






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