
रात का समय था। कमरे में हल्की पीली रोशनी जल रही थी और माहौल पूरी तरह शांत था। मैं और स्नेहा दीदी एक-दूसरे के सामने खड़े थे। उस खामोशी में सिर्फ हमारी सांसें सुनाई दे रही थी। मेरी नज़रें उनकी आंखों से हट ही नहीं रही थी। उनके चेहरे पर हल्की थकान थी, लेकिन साथ ही एक अलग-सी कोमलता भी थी। उस पल ऐसा लग रहा था जैसे हमें किसी ने रोक दिया हो और हम बस एक-दूसरे को देखते ही रहना चाहते हों।
कुछ सेकंड तक हम बिना कुछ कहे यूं ही खड़े रहे। फिर अचानक मैंने हिम्मत जुटाई और उन्हें अपनी बाहों में कस कर खींच लिया। उनके बदन की गर्माहट सीधे मेरे सीने में उतर गई। जैसे ही उनका सीना मेरे सीने से सटा, मैं साफ़ महसूस कर पा रहा था कि उनके मुलायम उभार मेरे साथ दब रहे हैं।






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