
बैंगलोर से आने के बाद मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा था। इस बार आते वक्त मैंने अपना हाथ स्नेहा दीदी के गुब्बारे पर बेझिझक रख दिया, और उन्होंने भी अपना हाथ मेरे लंड पर रख दिया था। वह एहसास बड़ा ही कमाल का था, मानो अब दुनिया में मुझे किसी और चीज़ की जरूरत ही नहीं थी। मेरी स्नेहा दीदी ने आखिरकार मुझे वह दिया था, जो मेरे लिए बहुत मायने रखता था।
वापस आने के बाद मैं हमेशा इसी इंतजार में रहता कि कब मम्मी-पापा बाहर जाएंगे और मुझे स्नेहा दीदी के साथ अकेले वक्त बिताने का मौका मिल सके। जब भी घर में कोई नहीं होता, मैं मौके का फायदा उठा कर उन्हें किस्स करने की कोशिश करता।






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