
करीब एक घंटे बाद दरवाज़े की कुंडी हल्के से खड़की। दीदी वापस आ चुकी थी। उनका चेहरा थका हुआ लग रहा था, आंखों में हलकी सी नमी और माथे पर पसीना। उन्होंने आते ही अपना बैग ज़मीन पर रखा और सीधे बेड पर बैठ गई। उन्होंने अपनी सफेद शर्ट की ऊपरी बटन खोल दी, और गहरी सांस लेते हुए लेट गई, मानो पूरे दिन की थकान अब जाकर उतर रही हो।
मैंने एक नज़र उनकी ओर देखा और बिना कुछ कहे पानी का गिलास भर कर उनकी तरफ बढ़ा दिया। उन्होंने पानी पीते हुए मेरी आंखों में देखा और हल्के से पूछा, “रात को तुमने मेरा बटन क्यों खोला था और… मेरा सीना छूने की कोशिश क्यों की थी?”






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